अंश संशोधन में मनमानी का आरोप, तहसील के चक्कर काट रहे किसान
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अंश संशोधन में मनमानी का आरोप, तहसील के चक्कर काट रहे किसान
इकौना तहसील में 90 फीसदी अंश गलत होने का दावा, फॉर्मर आईडी और खाद लेने में आ रही परेशानी
इकौना/श्रावस्ती। तहसील इकौना क्षेत्र में भूमि अभिलेखों में अंश निर्धारण और अंश संशोधन को लेकर किसानों की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। किसानों का दावा है कि तहसील क्षेत्र के कई गांवों में भूमि अभिलेखों में अंश का निर्धारण गलत दर्ज है। कुछ किसानों ने तो करीब 90 प्रतिशत अंश गलत दर्ज होने का दावा किया है।
किसानों के मुताबिक अंश में त्रुटि होने के कारण फॉर्मर आईडी बनवाने की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। इसके अलावा खाद समेत कृषि से जुड़ी विभिन्न सुविधाओं का लाभ लेने में भी उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
आवेदन के बाद भी तहसील और लेखपाल के चक्कर
किसानों का आरोप है कि अंश संशोधन के लिए आवेदन करने के बाद उन्हें समस्या के समाधान के लिए बार-बार तहसील और संबंधित लेखपाल के कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। उनका कहना है कि कई मामलों में जरूरी अभिलेख और पैरवी उपलब्ध कराने के बावजूद संतोषजनक जांच किए बिना ही रिपोर्ट आगे भेजे जाने का आरोप है।
कुछ किसानों ने अंश संशोधन के नाम पर अवैध धनराशि मांगे जाने के आरोप भी लगाए हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है।
ऑनलाइन प्रक्रिया में भी अड़चन
किसानों का कहना है कि भूमि का अंश सही दर्ज नहीं होने के कारण ऑनलाइन प्रक्रियाओं में भी दिक्कत पैदा हो रही है। इसका सीधा असर कृषि संबंधी कार्यों पर पड़ रहा है। कई किसान जरूरी प्रक्रिया पूरी नहीं कर पा रहे हैं, जिससे उनमें नाराजगी बढ़ती जा रही है।
डीएम से निष्पक्ष जांच की मांग
परेशान किसानों ने जिलाधिकारी से पूरे मामले का संज्ञान लेते हुए इकौना तहसील के सभी गांवों में अंश निर्धारण और अंश संशोधन की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। किसानों का कहना है कि लंबित आवेदनों का समयबद्ध तरीके से निस्तारण कराया जाए, ताकि उन्हें बार-बार तहसील के चक्कर न लगाने पड़ें।
इसके साथ ही किसानों ने मांग की है कि यदि जांच में किसी लेखपाल द्वारा जानबूझकर गलत रिपोर्ट लगाए जाने, कार्य में लापरवाही बरतने अथवा अवैध धनराशि मांगने की पुष्टि होती है तो संबंधित कर्मचारी के खिलाफ निलंबन समेत कठोर विभागीय कार्रवाई की जाए।
अब देखना यह है कि किसानों की शिकायतों पर प्रशासन क्या कदम उठाता है और अंश निर्धारण में बताई जा रही त्रुटियों की जांच के बाद वास्तविक स्थिति क्या सामने आती है।
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